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वक्त ही बताएगा

 ये वक्त हि बताएगा कि वक्त क्या हुआ हौशले कि आंधीयों में फर्क क्या पड़ा है इरादों को मजबूतीयो से साथ ले चला है चुपके से वो अपना हथियार ले चला है हौशले का वो ढाल तलवार ले चला है। अफसोस है कि ठहरा स्वभाव-भाव में हां कह कर मुस्कुराता रहे अपनेपन से वो कैसा है ये परवरीश कि मिजाज हैं हम तो उसमें साधो के लिए पूछते हैं कि वो तो एक अदा ले चला जान कर। वो खुली मैदान में लहराया परचम यूं ही होश उड़ गए ना जाने क्यों किस्मत के बेचैन खड़ी कि खड़ी रह गयी, हां ये वक्त हि बताएगा कि वक्त क्या हुआ हौशले कि आंधीयों में फर्क क्या हुआ हैं।
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पतझड़ कि वह रात- मैक्सिम गोर्कि

  पतझड़ की वह रात लेखक : मैक्सिम गोर्की बिलकुल नया शहर। जान न पहचान। न खाने के लिए जेब में पैसा और न रात बिताने के लिए साढ़े तीन हाथ जगह ही! पतझड़ के मौसम में ऐसी . थी एक दिन मेरी हालत! जिन-जिन कपड़ों के बगैर काम चल सकता था, सो मैंने सब एक-एक . कर के पहले तीन-चार दिन में बेच डाले और फिर शहर के उस भाग की ओर चला, जहां जहाज़ों के खड़े होने का अड्डा था। इस स्थान का नाम था ईस्ते। जहाज़ों के चलने के लिए अनुकूल मौसम में इस्ते मज़दूरों के कठोर जीवन के कोलाहल से जैसे उफूनता रहता है, परंतु वह अब सुनसान और वीरान था, क्योंकि अक्टूबर का महीना समाप्त हो चला था। गीली रेतीली भूमि पर मेरे पैर मुझे किसी तरह घसीटे ही लिए चले जा रहे थे, और उसे क्रेद-कुरेद कर कैसे भी खाने के टुकड़े की तलाश में लगे थे। और मैं भरपेट भोजन पा जाने की आशा में सूने मकानों और गोदामों की ख़ाक छान रहा था। आज की सभ्य दुनिया में हमारे पेट की भूख की अपेक्षा दिमाग की भूख आसानी से मिट जाती है। आप सड़कों पर चक्कर काठते हैं, बड़ी बड़ी आलीशान इमारतें देखते हैं, जो बाहर से तो खूबसूरत हैं ही, और अंदर से भी होंगी ही; उन्हें देख...

जमुनिया धार- शिवशंकर श्रीनिवास

  कहानीकार -  शिवशंकर श्रीनिवास  “जमुनिया धार' एक दिन मैं अपने दालान पर बैठा हुआ लिख रहा था । सामने वाले रास्ते से कुछ स्त्रियाँ पीछे की तरफ जा रही थीं । उनके हाथों में टोकरी थी और सूखे पत्ते बुहारने के लिए झाड़ू थे। जब तक मैं उन्हें आवाज देता, तब तक आम के पेड़ के नीचे खेल रहे बच्चे जोर से चिल्लाए। ये बच्चे हमें आगाह करने के लिए शोर मचा रहे थे कि सूखे पत्ते बुहारने वाली स्त्रियाँ आ रही हैं। ये बच्चे प्रायः इसी तरह शोर मचाकर, आवाज देकर हमें उनके बारे में सूचित करते थे। कभी-कभी यही बच्चे झूठ-मूठ का शोर मचाकर हमें ठगते भी हैं। जब हम इन बच्चों द्वारा ठगे जाते हैं और उनकी बातों में आकर उन बुहारने वाली औरतों को ढूँढ़ते हैं तो झूठी सूचना देने वाले उन बच्चों को बहुत मजा आता है। पर अभी उन खबरची बच्चों ने झूठ नहीं बोला था । उन औरतों को खुद मैंने भी देखा था, पर उस समय उन बच्चों का शोर मचाना अच्छा नहीं लग रहा था। लिखने के काम में बाधा आ रही थी । मैंने तो पहले ही काफी ऊँचे स्वर में उन स्त्रियों को पत्ते बुहारने से मना कर दिया था और उन्हें वापस लौटने के लिए कहा था । मैंने यह देखन...

मजदूर दिवस पर विशेष कविता

  मजदुर दो अतड़ियो कि कहानी नजंरो से अनजानी है चलती गाड़ियो पर लटकी जिन्दगी, मजदुर कि कहानी । जिने के सफर पे चली अनसुलझे से शहर में ताकती आखो से ढ़ुढे  गुमनाम खड़ी जिन्दगी । हवाये मगरुर है रोज फिजाये जरुरत है क्या नालियो में खड़ी जिन्दगी किस की गिरवी बने कल । सुलझे सवालो के साथ सड़के खामशो उसके साथ चुपचाप ख़ड़ा वक्त  कहा साथ, उसके साथ। चमड़ियो से अनजानी बनी दमड़ियो के भाव को बाजार में खड़ी, बेसुध जिन्दगी फिर से वह । बेच कर दम,दम भरता खरीदने के फिराक में सपने पेट के भरने को परिवार के साथ खड़ी । मजे के दुर से रिश्ते मजबूरी के रास्ते कहा मजे का रिश्तेदार मिले  मजदुर कि किश्मत कहा । सम्भाली है, रुमाली है जिन्दगी यही बताती है झाड़ के सड़क पर चौपाये किसी के भरोसे चली है । दो अतड़ियो कि कहानी रास्ते पर हसती चली  रोज के जरुरत में उलझे जिन्दगी बेहिसाब बिकी । रोटिया तोड़ने को ना जाने क्यो अतड़िया खराब खड़ी जिन्दगी मे मजबुरी कि  किस्मत मजदुर कि खड़ी । बेवजह खराब निकला  बारीसो का साथ मिला आज कहा बसर होगा कि सड़क भी खराब निकला । कही खोलियो के तलाश में कही बोलियो के...

हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है- रविन्द्र नाथ टैगोर

 

महावीर जयंती पर

 जैन धर्म के २४वें तिर्थंकार महावीर स्वामी कि जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। महावीरजी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था

रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि

 रामधारी सिंह दिनकर के पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है कविता "शब्दों के सुरज" के माध्यम से शब्दों का सुरज है धरा में छिपी हुयी सुरज की वो किरणे थी नभ नाभी तक जिनकी आने वाली रश्मे थी । है सुनहली आखो में उसका तो बस रंग यही ना छिपी रही है वो बादल के आ जाने से । नभ चेतना बह चली वही से जिसका बस अपमान हुआ सुरज के आ जाने से दिनकर का पथ ना आसान हुआ । है भभकती ज्वालाओ से आजादी का आविर्भाव हुआ उसी धरा में छिपा हुआ दिनकर भी साक्षात हुआ । था समय वो आग सा जलती सारी जनता थी किसी में भुख और किसी में प्यास भारी थी रंग कई ये वेश कई थे लोगों में रोष बड़े थे नही चेतना उसमें डालो कि क्रुरता का अंत हुआ था हिन्दी के लिये भारत का एक सपूत दिनकर खड़ा हुआ था । राज्यसभा के कोने से जीवन के एक उजाले से जिसने हुंकार भरी कविता वो अपमान भरी काले धन पर रोष किया दिनकर ने राजनिति पर प्रहार किया । है जोड़ता संवादो में कि जनता का यो राम बना है जलती ज्वालाओ की शब्दो का वो तिर यहा । समाजवाद के भूख में नेताओं से वसीभुत पथ लोकत्रेत के खातिर अब जिसने शब...