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सितंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिल से...

 डगर डगर कदम कदम रूप ने छला मुझे   मै आदमी भला हूं तुमने समझा मनचला मुझे  ये माना रूप तेरा सारे मुल्क का शबाब है  तो दिल मेरा भी कम नहीं लखनवी नवाब हैं। अगर रूप तेरे पास है तो दृष्टि मेरे पास है नदी तुम्हारा मोल बस मेरे अधर कि प्यास है बस एक इतना भेद है यही तो एक खेद है इधर बबूल देह है उधर बदन गुलाब हैं। ओ नवयुगिन देवियों मुझे भी मानो देवता भटक रही ओ चिठ्ठीयो तुम्हारा मैं ही हूं पता यूं तर्क में गढ़ों जो पढ़ सको पढ़ो मुझे उसी का आवरण हुं जिस ग़ज़ल की तू किताब है      लेखक - अकसर अंकित व प्रियांशु गजेन्द्र

हिंदी दिवस

 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाया जाता हैं, जो हिंदी के प्रति लोगों में एक सम्मान का भाव है । 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के द्वारा राजकाज की भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिला था । हिंदी को हमारे भारत में सबसे अधिक बोला जाता है इसलिए इसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ है। हिंदी भाषा को जन-जन की भाषा के रुप में भी जाना जाता है। बता दें कि हिंदी का इतिहास लगभग 1000 साल पुराना है। भारत देश आजाद होने के बाद पश्चात 14 सिंतबर 1949 को संविधान सभा द्वारा यह निर्णय लिया गया कि हिंदी देश को देश की राजभाषा बना दी जाएगी। यही कारण था कि हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है। हम सब मिलकर हिंदी को राष्ट्रभाषा भाषा बनने में अपना पूरा योगदान देंगे । "हम सब कि यही अभिलाषा हिंदी बने राष्ट्र भाषा" हिंदी दिवस पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं  जय हिन्द जय हिंदी

#RojgarDo #रोजगारदो

  # रोजगारदो          #RojgarDo              "रोजगार दो चाहे भत्ता लाख दो" हमें चाहिए हक अपना, रोजगार का हक अपना रोजगार को संविधान के मूल अधिकार में शामिल करें और वर्तमान यूवा और बेरोजगार जनता को रोजगार दो। क्योकि जीवन जीने का अधिकार और जीवन यापन का अवसर देने वाली व्यवस्था है। हमारे संविधान में और वो हमें चाहिए। भारत की भूमि पर जो व्यवस्था वर्तमान समय तक चलती रही है उसे देखते हुए देश के आम नागरिक को अपने लिए कुछ मांग रखना चाहिए या तो फिर समानता के लिए कुछ चुनिंदा सुविधाएं हटाने कि माग की जाने की ज़रूरत है। एक तरफ जनता के द्वारा चुने गए नेता जहां जमीन स्तर से पूर्णतः कट जाते हैं तथा जनता के धन पर कुंडली मारकर उसके धन का मजे लुटने   और अ पने पुस्तो को पालने  में लगे  हैं। तो वही  दूसरी तरफ आम ज नता में  (किसान, मजदूर और यूवा) आदि आम जनता जीवन पर्यन्त रोटी,कपड़ा, मकान में घिसता हुआ रोजगार के चक्कर में बिना किसी प्रकार की सुख सुविधा के घाटों पर चल...