डगर डगर कदम कदम रूप ने छला मुझे मै आदमी भला हूं तुमने समझा मनचला मुझे ये माना रूप तेरा सारे मुल्क का शबाब है तो दिल मेरा भी कम नहीं लखनवी नवाब हैं। अगर रूप तेरे पास है तो दृष्टि मेरे पास है नदी तुम्हारा मोल बस मेरे अधर कि प्यास है बस एक इतना भेद है यही तो एक खेद है इधर बबूल देह है उधर बदन गुलाब हैं। ओ नवयुगिन देवियों मुझे भी मानो देवता भटक रही ओ चिठ्ठीयो तुम्हारा मैं ही हूं पता यूं तर्क में गढ़ों जो पढ़ सको पढ़ो मुझे उसी का आवरण हुं जिस ग़ज़ल की तू किताब है लेखक - अकसर अंकित व प्रियांशु गजेन्द्र