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मजदूर दिवस पर विशेष कविता

 

मजदुर

दो अतड़ियो कि कहानी

नजंरो से अनजानी है

चलती गाड़ियो पर लटकी

जिन्दगी, मजदुर कि कहानी ।

जिने के सफर पे चली

अनसुलझे से शहर में

ताकती आखो से ढ़ुढे

 गुमनाम खड़ी जिन्दगी ।

हवाये मगरुर है रोज

फिजाये जरुरत है क्या

नालियो में खड़ी जिन्दगी

किस की गिरवी बने कल ।

सुलझे सवालो के साथ

सड़के खामशो उसके साथ

चुपचाप ख़ड़ा वक्त 

कहा साथ, उसके साथ।

चमड़ियो से अनजानी बनी

दमड़ियो के भाव को

बाजार में खड़ी, बेसुध

जिन्दगी फिर से वह ।

बेच कर दम,दम भरता

खरीदने के फिराक में

सपने पेट के भरने को

परिवार के साथ खड़ी ।

मजे के दुर से रिश्ते

मजबूरी के रास्ते कहा

मजे का रिश्तेदार मिले 

मजदुर कि किश्मत कहा ।

सम्भाली है, रुमाली है

जिन्दगी यही बताती है

झाड़ के सड़क पर चौपाये

किसी के भरोसे चली है ।

दो अतड़ियो कि कहानी

रास्ते पर हसती चली 

रोज के जरुरत में उलझे

जिन्दगी बेहिसाब बिकी ।

रोटिया तोड़ने को ना जाने

क्यो अतड़िया खराब खड़ी

जिन्दगी मे मजबुरी कि 

किस्मत मजदुर कि खड़ी ।

बेवजह खराब निकला 

बारीसो का साथ मिला

आज कहा बसर होगा कि

सड़क भी खराब निकला ।

कही खोलियो के तलाश में

कही बोलियो के तलाश में

चौराहे पर खड़ी जिन्दगी

बेहिसाब वक्त के साथ चली।

रोता था, छोटा सा तिनका

रोया था जब वक्त पलटा

किसी कोने में आज जगह

किश्मत के साथ मिली।

लहराती चलती है, उडती है

सड़को पर बेझिझक रहती

किसी के सिलसिले में 

मजदुरी आज मिली है ।

खाया, पिया वक्त के साथ

कुछ बचा किश्मत के साथ

जब तक दुर थे पैसा था

अब पास है तो कागज है ।

खत्म हो गये पता ना चला

मजदुरी कि नयी बात कहा

कागज थे उड़ गये हाथो से

 कि मजबुर था, उछलता कहा ।

कभी इस उस शहर

तो कभी मिर्ची नमक.

रोटी और पानी का पहर 

 खाया पिया वक्त गया

कि जिन्दगी कहा रुकती

मजदुरी कहा पर थमती ।

  - वेद प्रकाश सिंह

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