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#RojgarDo #रोजगारदो

 

#रोजगारदो          #RojgarDo

             "रोजगार दो चाहे भत्ता लाख दो"

हमें चाहिए हक अपना, रोजगार का हक अपना


रोजगार को संविधान के मूल अधिकार में शामिल करें और वर्तमान यूवा और बेरोजगार जनता को रोजगार दो।
क्योकि
जीवन जीने का अधिकार और जीवन यापन का अवसर देने वाली व्यवस्था है। हमारे संविधान में और वो हमें चाहिए।


भारत की भूमि पर जो व्यवस्था वर्तमान समय तक चलती रही है उसे देखते हुए देश के आम नागरिक को अपने लिए कुछ मांग रखना चाहिए या तो फिर समानता के लिए कुछ चुनिंदा सुविधाएं हटाने कि माग की जाने की ज़रूरत है।
एक तरफ जनता के द्वारा चुने गए नेता जहां जमीन स्तर से पूर्णतः कट जाते हैं तथा जनता के धन पर कुंडली मारकर उसके धन का मजे लुटने और पने पुस्तो को पालने में लगे हैं। तो वही दूसरी तरफ आम नता में (किसान, मजदूर और यूवा) आदि आम जनता जीवन पर्यन्त रोटी,कपड़ा, मकान में घिसता हुआ रोजगार के चक्कर में बिना किसी प्रकार की सुख सुविधा के घाटों पर चला जाता है। और इन सब बातों में एक बात इनके विकास के लिए इस बार ये बजट, फला योजना, आदि अंत तक आते रहते हैं। और लाभ किसको मिला अभी तक कि जनता भुखमरी, बेरोजगारी, गरीब, कुपोषण आदि में त्रस्त है फिर भी जनता अभी तक अपनी वर्चस्व को कायम रखे हुए है। आखिर दोष किसका है सरकार का या जनता का, ये मांग या व्यवस्था आखिर अब तक क्यो नही हो पाया कि सभी को एक आजीवन जीवन यापन कि सुविधा मिल सके, या फिर भोजन पानी मकान रोजगार आदि का, हां यदि संविधान में ये व्यवस्था है तो फिर खत्म क्यो नहीं हुआ ।
  इसका मतलब यह है कि संवैधानिक व्यवस्था में विफलता विराजमान है या फिर अंतिम निर्णायक के तौर पर संसद या फिर हमारी न्याय व्यवस्था विफल है, जो अभी तक इन अवरोधों को दूर नहीं कर सकीं जिससे आम जनमानस को  सही न्याय नहीं मिला सका अब तक ।
   
भारतीय जन जीवन को इस महामारी के समय में लोगों के सामने हाथ फैलाने कि जरूरत क्यो पड़ रही है, क्यो कुछ चुनिंदा लोगों से स्नेह की आशा है। क्या ये आम जनता देश के लिए कुछ भी नहीं है जो ५-१० किलो अनाज में जीवन यापन कर रही हैं, यहां बात महामारी के पहले कि भी हैं, लेकिन ये व्यथा अभी वर्तमान समय में और ज्यादा गंभीर रूप धारण किए हुए है, जिससे पूरे देश का एक व्यथित चेहरा सामने आया है, जो कहा तक अच्छा दिखता है,यह बहुत गूढ़ निराशाजनक है।
वेतन आयोग पर वेतन आयोग लाते हुए जहां ज्यादा से ज्यादा में लोगों में अमीरी गरिबी का अंतर भी बड़ता जा रहा है, वहि आम जनता के किसानों और मजदूरों के मेहनत को कुछ कुछ नौकरशाही के लिए इनके मेहनत का सबसे ज़्यादा भाग नौकरी वालों को दिया जा रहा है जो कहा तक न्यायसंगत हैं , कि हमारे न्ययालय और संवैधानिक व्यवस्था को नहीं दिखाई दे रहा है। कि किसका हक खाया जा रहा है और  हनन हो रहा है।
देश में किसानों का, मजदूरों को दो वक्त के रोटी के लिए इतना मेहनत आर्थिक कठिनाइयां और शासन चलाने वाले  का आर्थिक इतिहास मजबूत कैसे होता जा रहा है। कि कोई भी किसान अपने बच्चों को किसान नहीं बनने कि आशा करता , और उसे यहां तक लगता है कि भले ५-७ हजार हि कमाओं लेकिन खेती करने का नाम मत लो ।

इसका फैसला कौन करेगा की कौन किसका हक खा रहा है, न्ययालय, जनता या नेता । वैसे कर्त्तव्य सबका  है जनता को हक के लिए बार बार लड़ना पड़ेगा तो संवैधानिक कार्यपालिका और न्ययालय क्या करेंगे, ये जरूरी नहीं की पी.आई.ल. डलेगा तभी न्ययालय फैसला करेगा, न्ययालय को स्वैच्छिक रुप से कुछ फैसले करने चाहिए जो हक और मानवतावादी हो।
क्योंकि जीस तबके कि बात हो रहा है वो अपना पेट भरने में इतना असमर्थ हैं कि पुरे समय काम में निकल जाता है और भर भी नहीं पाता , चुकी विशेष खर्च आम जनता का है नौकरशाही पर जिसमें न्यायाधीश और नेता दोनो आते हैं और दोनों ही शांत बैठे रहते हैं।

किसान को अन्नदाता कह देने से उसकी आर्थिक कठिनाइयां दूर नहीं होती, मजदूर से ताबड़तोड़ मेहनत करवाने से उसकी आर्थिक कठिनाइयां दूर नहीं होती हैं।
आखिर क्यों ना आम जनता को एक ऐसी रासी (मुद्राएं) दि जाए जिससे उन्हें किसी महिने में ज्यादा खर्च होने या विषम परिस्थिति में भी जीवन चालन संसाधन निरंतर मिलती रहे।
वर्तमान परिस्थितियों में इनकी ज्यादा आवश्यकता है कि आर्थिक मदद किया जाए।  नेताओं के संसाधनों को कम कर के उन्हें आम जनमानस में रहने के बराबर बनाया जाए आर्थिक रूप से। नौकरशाही में बेतन को कम करके या आम जनता में बेरोजगार को भत्ता( जीवन यापन) का देकर समानता लाया जाए। जिससे आम जनमानस के हनन को कम किया जाय।
यहां हक के लिए आम जनता को लड़ना चाहिए।
यूवा बिमार चल रहै है जिसका एक मात्र कारण बेरोजगारी हैं , और यही अवस्था रहा तो आगे के समय में मानसीक बिमारी एक और महामारी लाएगी जिसका एक मात्र कारण वर्तमान कि सरकार को देना पड़ेगा।
जीवन जीने का अधिकार तो है, पर जीवन यापन का अवसर कब मिलेगा इसको मूल अधिकार में भी लाने कि जरूरत है।
अब एक ही रास्ता  "रोजगार दो चाहे भत्ता लाख दो"
            "हमें चाहिए हक जीवन यापन के सब
              रोजगार दो चाहे भत्ता लाख दो"
#Rojgardo

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