दिल-ए-इलाहाबाद
यूं तो वर्षों में पहचान बना लेता हैं
ये शहर इलाहाबाद है जो हमारे
दिल को मद्धम सा धड़का देता है।
कुछ तो कशक हैं इनके दिवारो में
ये खुद-ब-खुद अबा निकल आते हैं।
है कभी इन्कलाब इनके गलीयो में
हमें फिर से वहीं सर्द मौसम में
अपने कमरे कि याद दिला जाती है।
संगम के दोपहरी से मेलजोल बढ़ाए
कुछ देर तक नजरें मिलाए जाते
किले पर बातों का किला बनाए
हमारे दोस्त भी बड़बड़ाये हुए
सांझ को लेकर दिन में नशा दे दे।
हड़बड़ी नहीं है चुनाव आते गए
हमारे भी इरादे कुछ कम नहीं हैं
जो भरी जबानी में सर झुकाए
कितने नेता बदले कितने परिणाम
ये गणना तो हमारे परीक्षा बताए।
कुछ बदला तो सिर का हिसाब
नहीं तो इरादे कुछ बदल जाए
ये स्वाभिमान कहते ना बदला
भले बकैती का हिसाब बदला।

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