खतरनाक है खोपड़ी
निज हाफ कर जब खग बोला
ऐसा पीड़ा से जब वह बोला
मन मेरा व्यथित हो गया
जब रावण का मुख दस बोला ।
कहा मेघ को, वाणी से मत
खेल यहाँ पर रण का कर
चल दे दुगाँ तुक्षको सर्वस्व
बस काट के सिर उस नर का दे ।
अटल विचल कि लालसा मे
कुच नही करता फिर क्यों
कत्तर्व्यो के बोक्ष तले वो
गिरा धरा पर शिख बन ।
टुटे तन की अभिलाषा सा
मन को अब विचलित न कर
ऐ मेघदुत तु अब क्यो
रण से ऐसे कुंठित होय ।
खतरनाक है खोपड़ी के कुछ अंश प्रकाशित किया गया है

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