ये वक्त हि बताएगा कि वक्त क्या हुआ हौशले कि आंधीयों में फर्क क्या पड़ा है इरादों को मजबूतीयो से साथ ले चला है चुपके से वो अपना हथियार ले चला है हौशले का वो ढाल तलवार ले चला है। अफसोस है कि ठहरा स्वभाव-भाव में हां कह कर मुस्कुराता रहे अपनेपन से वो कैसा है ये परवरीश कि मिजाज हैं हम तो उसमें साधो के लिए पूछते हैं कि वो तो एक अदा ले चला जान कर। वो खुली मैदान में लहराया परचम यूं ही होश उड़ गए ना जाने क्यों किस्मत के बेचैन खड़ी कि खड़ी रह गयी, हां ये वक्त हि बताएगा कि वक्त क्या हुआ हौशले कि आंधीयों में फर्क क्या हुआ हैं।